Thursday, December 9, 2010

मंदिर और तुम्हारा घर

मंदिर से
जब भी गुजरता हूँ
लगता है
तुम हो वहां
तुम्हारे घर से
जब भी गुजरता हूँ
मंदिर सा लगता है
 
चढ़ते  हुए  सीढियां 
मंदिर की
लगता है 
तुम हो साथ 
बांधे दोनों हाथ  
श्रद्धा से
 
ईश्वर के सामने
करता हूँ आराधना
बंद आँखों के सामने
आ जाता है 
चेहरा तुम्हारा मुस्कुराता 
कहता है 
क्यों हो झोली फैलाये
सब कुछ तो है
पास तुम्हारे
 
पहुंचना चाहता हूँ जब 
तुम्हारे घर 
पवित्रता बढ़ जाती है मन की 
लगता है कदम 
बढ़ रहे है 
देवालय की ओर 
कानों में शंख ध्वनि 
सुनाई देने लगती है  
 
देखकर तुम्हें
शांत हो जाता है मन
मानो पा लिया हो मोक्ष
मिल गया हो निर्वाण
संतुष्टि का भाव
भर जाता है मन प्राण में
फिर कुछ और की
कामना ही नहीं बचती .
 
असमंजस में हूँ
कि मंदिर में
मिलती हो तुम
और तुम्हारे घर भगवान
घर है मंदिर
या मंदिर है तुम्हारा घर
दोनों एक दूसरे में
विलीन हो गए है
अब तुम्हीं बताओ
जाऊं किधर मैं .
 

29 comments:

  1. जब प्यार पूजा हो जाए तो ऐसा ही लगता है, होता है।

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  2. बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति.

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  3. असमंजस में हूँ
    कि मंदिर में
    मिलती हो तुम
    और तुम्हारे घर भगवान
    घर है मंदिर
    या मंदिर है तुम्हारा घर
    दोनों एक दूसरे में
    विलीन हो गए है
    अब तुम्हीं बताओ
    जाऊं किधर मैं .
    ______________________

    काबे का एहतराम भी मेरी नज़र में है
    सर किस तरफ झुकाऊं तुझे देखने के बाद

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  4. जब पता न चले कि मन का समर्पण कहाँ है तो यह दुविधा आवश्यक है।

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  5. घर है मंदिर
    या मंदिर है तुम्हारा घर
    दोनों एक दूसरे में
    विलीन हो गए है

    वाह...अद्भुत रचना है ये आपकी...मेरी बधाई स्वीकार करें.

    नीरज

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  6. namaskaar !
    ishwar wahi hai jaha shradha hoti hai , sunder .
    sadhuwad

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  7. कुछ इश्क विश्क का चक्कर लगता है

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  8. पवित्र प्रेम का दिव्य स्वरूप ऐसा ही होता है जहाँ पता ही नही चलता कौन किसमे समाहित है या एक दूजे से कौन जुदा है या कहिये जहाँ "मै" और "तू" का भेद मिट जाये बस सिर्फ़ प्रेम ही रह जाये वो ही प्रेम की पूर्णता है…………बेहद उम्दा अभिव्यक्ति।

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  9. itna pavitra prem ho pata hai kya???
    sirf shabdo ki baat lagti hai...:)


    Arun sir! chhoti muh badi baat.....par sach kahun...ye aapke jod ki kavita nhi haiiii.....ye to ham jaise so called kavi likhe to chalega:)

    aap to vartmaan ko chhute ho to maja aa jata hai!!

    anyway, mere lekhni se behtar hai...

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  10. अहसासों का बहुत अच्छा संयोजन है ॰॰॰॰॰॰ दिल को छूती हैं पंक्तियां
    किसकी बात करें-आपकी प्रस्‍तुति की या आपकी रचनाओं की। सब ही तो आनन्‍ददायक हैं।

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  11. indu puri goswami to me

    "ओ माय गोड! कितनी प्यारी कविता है.एकदम मुझ-सा सोचते हो.सच्ची.यहीं आ कर प्यार खुदा बन जाता है एक अलौकिक प्रेम यानि खुदा,ईश्वर,भगवान कुछ भी नाम दे दो सब एक हो जाते है और प्रेम करने वाले???? खुद भी इश्वर का ही रूप.....एक दुसरे के लिए."....

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  12. @ मानिक भाई
    @ मनोज सर
    @ शिखा जी
    @प्रदीप कान्त जी
    @मीनू जी
    @ नीरज गोस्वामी जी
    @ सुनील जी
    @ कुवर जी
    @ वंदना जी
    @ संजय भाई
    @ इंदु जी
    मेरे नए ब्लॉग पर आने और सहयोग के लिए बहुत बहुत आभार !

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  13. @ मुकेश भाई
    आपका बेबाकीपन अच्छा लगा... आपकी अपेक्षा पर खड़ा उतरु इसकी कोशिश करूँगा.. प्रेम भी जीवन का एक अहम् हिस्सा है.. मुझेसे बेहतर आप जानते हैं.. मेरी कविता एक रंग थी उस प्रेम की.. उस से अधिक कुछ नहीं..

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  14. मुकेश जी मेरे छोटे भाई हैं, लिहाज़ा उन्हीं की बात का उत्तर देते हुए अपनी बात रखता हूँ... पवित्र प्रेम होता है क्या.. यह सवाल उनकी ही एक कविता से उपजा है ( मुकेश भाई, भूल तो नहीं कर रहा ना).. और सच भी क्योंकि जो उन्होंने देखा वो सच था... लेकिन सचाई यह भी है कि आज सौतेली माँ के कहने पर बाप की बात मान कोई 14 सालों के लिए घर नहीं छोड़ देता... कोई ऐसा भाई नहीं मिलता जो बिना कुछ सोचे बड़े भाई के पीछे चल देता है, एक पत्नी 14 साल चौखट पर खड़ी अपने पति की प्रतीक्षा करती नहीं रह जाती… लेकिन वाल्मीकि का लिखा वो आज के समय में इर्रेलेवेंट हो चुका नॉवेल आज भी लाल कपड़े में लिपटा पूजा घर में रखा जाता है.. सिर्फ इस उम्मीद पर कि ये किरदार जो उस किताब में क़ैद हैं हमारे लिए मर्यादा और परंपरा की एक मेयार, एक मानदण्ड!
    यह कविता उसी प्रेम को रेखांकित करती है. मुझे तो ऐसा लगा कि परदेस में रहते हुए ये मेरे और पटना में रह रही मेरी सत्तर वर्षीया गर्लफ्रेंड की कहानी है, जिसे मैं अपनी माँ कहता हूँ.
    ब्याह कर जिस घर में आई थी 53 साल पहले आज भी हमको मंदिर के तरह लगता है और जिस भी मंदिर में जाता हूँ पता नहीं क्यूँ हर देवता की मूरत में वही नज़र आती है! कभी कभी लगता हैः
    असमंजस में हूँ
    कि मंदिर में
    मिलती हो तुम
    और तुम्हारे घर भगवान
    घर है मंदिर
    या मंदिर है तुम्हारा घर
    दोनों एक दूसरे में
    विलीन हो गए है
    अब तुम्हीं बताओ
    जाऊं किधर मैं .

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  15. @सलिल जी
    आपकी इस टिप्पणी से मेरी कविता को पुनः परिभाषित हो गई.. कविता लिखते समय जिस द्वन्द को मैं महसूस कर रहा था आपने उसे रेखांकित कर दिया है... आपका बहुत बहुत आभार...

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  16. Dr.mukesh gautam to me
    "ACHCHI RACHANA HAI. SHABDO KA CHAYAN AUR STHAN BHI ACHCHA HAI . BADHAI. Dr. MUKESH GAUTAM"

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  17. Aapka blog vaapas milne par bahut bahut badhaai ....

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  18. मैं मधुशाला के अंदर हूं या मेरे अंदर मधुशाला.

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  19. असमंजस में हूँ
    कि मंदिर में
    मिलती हो तुम
    और तुम्हारे घर भगवान
    घर है मंदिर
    या मंदिर है तुम्हारा घर
    दोनों एक दूसरे में
    विलीन हो गए है
    अब तुम्हीं बताओ
    जाऊं किधर मैं .
    जब घर मंदिर हो जाता है और मंदिर घर फिर किधर भी जाया जाए बात तो एक ही है...मंजिल एक ही है....
    बहुत ही अच्छा रचना...

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  20. जय श्री कृष्ण...आपका लेखन वाकई काबिल-ए-तारीफ हैं....नव वर्ष आपके व आपके परिवार जनों, शुभ चिंतकों तथा मित्रों के जीवन को प्रगति पथ पर सफलता का सौपान करायें .....मेरी कविताओ पर टिप्पणी के लिए आपका आभार ...आगे भी इसी प्रकार प्रोत्साहित करते रहिएगा ..!!

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  21. तुम्हारे घर से
    जब भी गुजरता हूँ
    मंदिर सा लगता है...

    बहुत सुन्दर , निश्छल अभिव्यक्ति।

    .

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  22. कहाँ गायब हो ?? लिख क्यों नहीं रहे ??

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  23. अरूण जी, अनुभूति की पराकाष्‍ठा को छूती एक लाजवाब कविता। जितनी तारीफ करूं, कम लगती है।

    ---------
    ध्‍यान का विज्ञान।
    मधुबाला के सौन्‍दर्य को निरखने का अवसर।

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  24. बहुत भावभीनी प्रस्तुति |बधाई |
    आशा

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  25. घर है मंदिर
    या मंदिर है तुम्हारा घर
    दोनों एक दूसरे में
    विलीन हो गए है

    वाह...लाजवाब कविता। बधाई स्वीकार करें

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  26. bahut sundar lagi kavita... kunwar kusmesh ji ki baat par hasi aa gayi.. :))

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